Geeta Updesh

Geeta Updesh

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैं ह्यात्मनों बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

अर्थ – 

भगवान कृष्ण जी अर्जुन को बताते हैं कि हे अर्जुन, ये आत्मा ही आत्मा का सबसे प्रिय मित्र है और आत्मा ही आत्मा का परम शत्रु भी है इसलिए आत्मा का उद्धार करना चाहिए, विनाश नहीं| जिस व्यक्ति ने आत्मज्ञान से इस आत्मा को जाना है उसके लिए आत्मा मित्र है और जो आत्मज्ञान से रहित है उसके लिए आत्मा ही शत्रु है |

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