Geeta Updesh

Geeta Updesh

गुरूनहत्वा हि महानुभवान श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |
हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ||

अर्थ –

महाभारत के युद्ध के समय जब अर्जुन के सामने उनके सगे सम्बन्धी और गुरुजन खड़े हो जाते हैं तो अर्जुन दुःखी होकर श्री कृष्ण जी से कहते हैं कि अपने महान गुरुओं को मारकर जीने से तो अच्छा है कि भीख मांगकर जीवन यापन कर लिया जाये| भले ही वह लालचवश बुराई का साथ दे रहे हैं लेकिन वो हैं तो मेरे गुरु देव ही, उनका वध करके अगर मैं कुछ हासिल भी कर लूं तो वह सब उनके रक्त से ही सना होगा|

Share this with friends