Prernadayak

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ठोकर खाकर ही व्यक्ति संभालता है | गिर- कर उठना और फिर भविष्य में संभलकर चलने में ही महानता है | बार – बार ठोकर लगने पर यहाँ न समझना चाहिए की राह विकट है और इस पर तो चलना बेकार है |

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