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योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते || अर्थ –  श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन सफलता और असफलता की आसक्ति को त्यागकर सम्पूर्ण भाव से समभाव होकर अपने कर्म को करो| यही समता की भावना योग कहलाती है| Rate this postRead Full Quote

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उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।आत्मैं ह्यात्मनों बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ अर्थ –  भगवान कृष्ण जी अर्जुन को बताते हैं कि हे अर्जुन, ये आत्मा ही आत्मा का सबसे प्रिय मित्र है और आत्मा ही आत्मा का परम शत्रु भी है इसलिए आत्मा का उद्धार करना चाहिए, विनाश नहीं| जिस व्यक्ति ने आत्मज्ञान से इसRead Full Quote

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त्रिभिर्गुण मयै र्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत।मोहितं नाभि जानाति मामेभ्य परमव्ययम् ॥ अर्थ – भगवान श्री कृष्ण जी अर्जुन से कहते हैं कि हे पार्थ! सत्व गुण, रजोगुण और तमोगुण, सारा संसार इन तीन गुणों पर ही मोहित रहता है| सभी इन गुणों की इच्छा करते हैं लेकिन मैं (परमात्मा) इन सभीRead Full Quote

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प्रकृतिम स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन: ।भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशम प्रकृतेर्वशात॥ अर्थ – गीता के चौथे अध्याय और छठे श्लोक में श्री कृष्ण जी कहते हैं कि इस समस्त प्रकृति को अपने वश में करके यहाँ मौजूद समस्त जीवों को उनके कर्मों के अनुसार मैं बारम्बार रचता हूँ और जन्म देता हूँ| RateRead Full Quote

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प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ अर्थ – श्री कृष्ण जी कहते हैं कि हे पार्थ, इस संसार में समस्त कर्म प्रकर्ति के गुणों द्वारा ही किये जाते हैं| जो मनुष्य सोचता है कि “मैं कर्ता हूँ” उसका अन्तःकरण अहंकार से भर जाता है| ऐसी मनुष्य अज्ञानीRead Full Quote

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पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥ अर्थ – श्री कृष्ण अर्जुन जी से कहते हैं कि इस समस्त संसार का धाता अर्थात धारण करने वाला, समस्त कर्मों का फल देने वाला, माता, पितामह या पिता , ओंकार, जानने योग्य और ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद भी मैंRead Full Quote

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परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ अर्थ – श्री कृष्ण जी कहते हैं कि हे अर्जुन, साधू और संत पुरुषों की रक्षा के लिये, दुष्कर्मियों के विनाश के लिये और धर्म की स्थापना हेतु मैं युगों युगों से धरती पर जन्म लेता आया हूँ| Rate this postRead Full Quote

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न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ अर्थ – श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन, तीनों लोकों में ना ही मेरा कोई कर्तव्य है और ना ही कुछ मेरे लिए प्राप्त करने योग्य अप्राप्त है परन्तु फिर भी मैं कर्म को ही बरतताRead Full Quote

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न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ ।कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ अर्थ – ये निश्चित है कि कोई भी मनुष्य, किसी भी समय में बिना कर्म किये हुए क्षणमात्र भी नहीं रह सकता है | समस्त जीव और मनुष्य समुदाय को प्रकृति द्वारा कर्म करने पर बाध्य किया जाता है|Read Full Quote

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न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरियो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु: |यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेSवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः || अर्थ – अर्जुन कहते हैं कि मुझे तो यह भी नहीं पता कि क्या उचित है और क्या नहीं – हम उनसे जीतना चाहते हैं या उनके द्वारा जीते जाना चाहते हैं|Read Full Quote

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कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः |जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् || अर्थ – श्री कृष्ण जी कहते हैं कि हे अर्जुन, ईश्वरभक्ति में स्वयं को लीन करके बड़े बड़े ऋषि व मुनि खुद को इस भौतिक संसार के कर्म और फल के बंधनों से मुक्त कर लेते हैं| इस तरह उन्हेंRead Full Quote

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गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌ ।प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌॥ अर्थ –  श्री कृष्ण जी कहते हैं कि हे पार्थ, इस समस्त संसार में प्राप्त होने योग्य, समस्त जग का स्वामी, सबका पोषण कर्ता, शुभाशुभ को देखने वाला, प्रत्युपकार की चाह किये बिना हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति वRead Full Quote

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दुरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धञ्जयबुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः || अर्थ – श्री कृष्ण जी अर्जुन से कहते हैं कि हे पार्थ अपनी योग,बुद्धि और चैतन्य द्वारा निंदनीय कर्मों से दूर रहो और समभाव से भगवान की शरण को प्राप्त हो जाओ| जो व्यक्ति अपने सकर्मो के फल को भोगने के अभिलाषीRead Full Quote

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बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप॥ अर्थ – श्री कृष्ण जी कहते हैं कि हे अर्जुन, हमारा यही केवल एक जन्म नहीं है बल्कि पहले भी हमारे हजारों जन्म हो चुके हैं, तुम्हारे भी और मेरे भी परन्तु मुझे सभी जन्मों का ज्ञान है,Read Full Quote

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अनाश्रित: कर्मफलम कार्यम कर्म करोति य:।स: संन्यासी च योगी न निरग्निर्ना चाक्रिया:।। अर्थ – श्री कृष्ण जी कहते हैं कि हे अर्जुन, जोभी भी मनुष्य बिना कर्मफल की इच्छा किये हुए कर्म करता है व अपना दायित्व मानकर सत्कर्म करता है वही मनुष्य योगी है और जो मनुष्य सत्कर्म नहींRead Full Quote

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अजो अपि सन्नव्यायात्मा भूतानामिश्वरोमपि सन ।प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥ अर्थ – श्री कृष्ण जी कहते हैं कि हे पार्थ, मैं एक अजन्मी तथा कभी ना नष्ट होने वाली आत्मा हूँ| इस समस्त प्रकृति को मैं ही संचालित करता हूँ, इस समस्त सृष्टि का स्वामी भी मैं ही हूँ| मैं योगRead Full Quote

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गुरूनहत्वा हि महानुभवान श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् || अर्थ – महाभारत के युद्ध के समय जब अर्जुन के सामने उनके सगे सम्बन्धी और गुरुजन खड़े हो जाते हैं तो अर्जुन दुःखी होकर श्री कृष्ण जी से कहते हैं कि अपने महान गुरुओं को मारकर जीने सेRead Full Quote

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ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ अर्थ इस श्लोक का अर्थ है: विषयों (वस्तुओं) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने विषयासक्तिRead Full Quote

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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ अर्थ – इस श्लोक का अर्थ है: कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं… इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो और न ही काम करने में तुम्हारी आसक्ति हो। (यह श्रीमद्भवद्गीता के सर्वाधिक महत्वपूर्ण श्लोकों मेंRead Full Quote

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परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥  अर्थ – इस श्लोक का अर्थ है: सज्जन पुरुषों के कल्याण के लिए और दुष्कर्मियों के विनाश के लिए… और धर्म की स्थापना के लिए मैं (श्रीकृष्ण) युगों-युगों से प्रत्येक युग में जन्म लेता आया हूं। Rate this postRead Full Quote

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हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥ अर्थ – इस श्लोक का अर्थ है: यदि तुम (अर्जुन) युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती का सुख को भोगोगे… इसलिए उठो, हे कौन्तेय (अर्जुन), और निश्चय करकेRead Full Quote

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नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत ॥ अर्थ – इस श्लोक का अर्थ है: आत्मा को न शस्त्र  काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने आत्माRead Full Quote

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यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ अर्थ– इस श्लोक का अर्थ है: हे भारत (अर्जुन), जब-जब धर्म ग्लानि यानी उसका लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूं अर्थात अवतार लेता हूं। Rate thisRead Full Quote

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